आओ सुनाऊं तुमको मैं!
नारी की व्यथा कथा!!
नारी की जुबानी नारी की कहानी!
कहती हूं मैं सत्य कथा!!
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पिता ने त्यागा बोझ समझ!
ससुराल में भी न मिला सम्मान!!
पराये घर की बेटी कहकर!
हरदम किया उसका अपमान!!
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घर में थी तब बेटी थी!
भगिनी इक भाई की !!
बहु बनी पराये घर में!
जननी बन फिर आई!!
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हर रिश्ते को निभा चली!
पर उफ कभी न किया!!
सबको जोड़ रखने की खातिर!
जुबां को भी सी लिया!!
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कौन समझेगा व्यथा कथा!
सबको अपनी ही फ़िक्र रही!!
घर की प्रमुख प्रमुख बातों में!
ना उसकी कोई ज़िक्र रही!!
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हर कर्तव्य निभाती वह. तो !
जननी से ले महरी बन !!
नारी ही कर सकती है!
घर की रक्षा प्रहरी बन!!
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फिर भी न समझे कोई!
तानों से उतारें आरती!!
चुप रहकर वो सहती जाए!
जैसे धरे धीरज धरती!!
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-- स्मृति
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