प्याला मदहोशी क्या देगा जो तेरी नजरें देती है
मैकादा खुशबू क्या देगा जो तेरी जुल्फें देती हैं
मिलन भुवन में कब होगा ये तो मौला ही जाने
तेरी आहट ही रुख़सारों को लाल सुर्ख कर देती है
यादों ने इन आंखों को आँसू में डुबोये है
हमने तो तेरी खातिर चैन औ सुकूँ भी खोये हैं
हिज्र ए बादल भिगोयेंगे बरसकर अब मुझे कितना
उसके रुखसार ने बदन के हर इक रोम भिगोये हैं
तेरी यादों का हर हाला,का प्याला हम भी पी लेते
सह लेते हिज्र तेरी, ये जीवन हम भी जी लेते
मगर एहसास को तेरे रखे, किस दिल अटारी में
तीर याद ए नयन हर भीत को भी भेद देते हैं ।।
नीरज कुमार द्विवेदी
बस्ती - उत्तर प्रदेश
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