पापा
गला रूंध जाता है
दिल भर आता है
आँखें गिली हो जाती है
शब्द धुंधला जाते हैं
पापा ....
कुछ यादें , कुछ स्वप्न
पूरे हुए , पर अनकहे
कहने को बहुत कुछ
सुनने को कोई नहीं
पापा..................
हर पल,हर वक्त
एक टीस,एक दर्द
किसे कहूँ,दिल खोलूँ
क्या सपने में ही बोलूँ!!
पापा......
नीरजा शर्मा
-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।