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युद्ध एक विभिषिका

Neeru Jain

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पत्थरों ने गीत गाए शांत नदिया रो पड़ी।
        
                                                    
                            
धूल धुसरित वादियां भी बन तमाशाई जड़ी ।।

गीत रूठे हैं वहां पर मौन हैं किलकारियां ।
राह देखें शावकों की गोदियां सूनी पड़ीं।।

हर तरफ उठता धुआं सा घोंटता दम सांस के ।
रोज गिनते लाश को सब आंसुओं की है झड़ी।।

सुन रहें क्रंदन प्रजा का मौन बैठे सिंह यूं।
आज राजा हैं शिकारी आई कैसी ये घड़ी।।

जान पर सबके बनी है पर समझते खेल है।
फट रहे हैं बम वहां पर आतिशों की ज्यूं लड़ी।।

फैसला कोई करा दे तो लगेगा आज यूं।
बादलों ने राग छेड़े नाचती बूंदें खड़ी।।

नीरू जैन निरुपमा
मेरठ उत्तर प्रदेश
3 वर्ष पहले
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