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अपना बापू....

Nikhil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो बापू भी अपना निराला था
        
                                                    
                            
जो धोती कुर्ते वाला था
अरे हाँ वही जो गोल चश्मे वाला था
कितना वो मतवाला था
आजाद भारत का सपना जिसने पाला था
अंहिसा की नीती से अंग्रेजों को डरा डाला था
दुबली पतली कद काठी
हाथों मे थी उनके दांडी
जलाई उन्होंने शांति की बाती
संग थी उनके पूरे देश की आबादी
एक ही उनका नारा था
अहिंसा परमो धर्म हमारा था
सदैव सत्य की लौ को किया उज्जवल
स्वभाव से भी थे एक दम निर्मल
मन मे थे उनके राम बसते
करते थे वो प्यार सबसे
हर संस्कृति का वो थे सम्मान करते
रामराज्य के सपने थे आँखों मे बसते
अंतिम श्वास तक रहे वो सच की राह पे डटके
अंतिम शब्द भी उनके मुख से हे राम ही निकला.....

- निखिल कुमार "अंजान"

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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