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मेरे पिता.....

Nikhil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दर्द अपना बता सकता नहीं
        
                                                    
                            
यादें तुम्हारी भूला सकता नहीं
पिता होने का फ़र्ज़ तुमने बखूबी निभाया
उंगली पकड़ कर चलना सिखाया
पिता पुत्र के रिश्ते से बढ़कर
सखा होने का एहसास जगाया
मित्र बनकर जीवन का पाठ पढाया
कैसे भूलूं वो बातें और खूबसूरत यादें
जिनका एहसास तुमसे जुड़ा है 
जब भी वो खूबसूरत पल याद आते हैं 
छलक कर आंसू आँखे नम कर जाते हैं 
तुम्हारा झुठा गुस्सा और सच्चा प्यार
मिस करता हूँ हर दिन और रात
जब भी तुम्हारी याद आती है 
अतीत की गहराई में जिंदगी लौट जाती है 
अब तुम्हारी बातें और यादें ही है साथ
मिटा सकती नही ये जिंदगी
ये यकीन है मेरे पास
तुम्हारे न होने के एहसास से जब घबराता हूँ 
आँखें बंद कर लेता हूँ और
सामने तुम्हारा मुस्कुराता हुआ चेहरा पाता हूँ 
तुम्हारे होने के एहसास के साथ
निश्चिंत होकर उन यादों के साथ सो जाता हूँ
दर्द अपना बता सकता नहीं
यादें तुम्हारी भूला सकता नहीं

- निखिल कुमार

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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