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काला रंग

Nikita

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            है काले रंग का ही दोष ये सब,
        
                                                    
                            
जो पाता है व्यंग-कटाक्ष हरदम,
सोखता है कितने रंग अनेक,
फिर भी तंज में दिखता सदैव।
करता है किरणों को सदा समाहित,
वो स्वयं क्षितिज, आरम्भ है वो,
ब्रह्माण्ड के विकास का कथाकार है,
वो है आकर्षण, वो निराकार है।
वो उपन्यास में स्तुति है काया की,
वो है पहेली मन को मोहे जो।
कुछ है पृथक उसका अस्तित्व,
कुछ है विचित्र उसका महत्व,
है शून्य वही, है गूंज वही,
तम है स्वरुप, प्रकाश विलीन,
उप्लब्धियाँ उसकी कुछ को दिखती नही,
गुण है विविध जो बिकती नही,
अपशगुन- अशुभ की उपमा मिलती रही ,
वो नही करता अपना बचाव,
वर्षों से दोषी बनता रहा,
अपने ही नाम से छुपता रहा,
है काले रंग का ही दोष ये सब,
जो पाता है व्यंग-कटाक्ष हरदम।।

-निकिता
2 वर्ष पहले
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