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मन करता है

NISHANT KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            
झर झराती झरनों सा,
मन करता है बहता जाऊँ |
पर्वतों नदियों से होता,
सागरों में गिरता जाऊं |

सर सराती पवनों सा,
मन करता है उड़ता जाऊँ |
खेतों खलिहानों से होता,
सांसो में समाता जाऊँ |

लहरहाती वृक्षों के छांव सा,
मन करता है सबको रिझाऊँ |
पक्षियों से बातें करूँ,
दाना देकर उन्हें बुलाऊँ |

रिम झिमाती बूंदों सा,
मन करता है बरसता जाऊँ |
हर सूखे पत्ते पर गिरकर,
हरियाली को वापस लाऊं |

सावन की धीमी फुहारों सा,
मन करता है भींगाता जाऊँ |
कागज की नौका बनकर,
डूबने तक मैं तैरता जाऊँ ।

सुगबुगाती चिंगारी सा,
मन करता है सुलगता जाऊँ |
बुझ रही मन की ज्वाला में,
थोड़ी सी उम्मीद जगाऊं |

घनघोर अंधियारे में दीपक सा,
मन करता है जलता जाऊँ |
किसी के अंधरे जीवन में,
रौशनी का दिया जलाऊँ |

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