रात में
सोने के बाद
बीतते पहर के साथ
तुम्हारी सिलवटे आहिस्ता-आहिस्ता ताजा होने लगती है
तुम्हें सोचने और खोजने लगता है
ये अन्तर्मन
और बनने लगता एक नक्श
सुषुप्त आँखों के सामने
हूबहू तुम जैसा ही
जैसे धीरे-धीरे सूर्य अपना आकर बढ़ाता है
वैसे ही तुम्हरा भी विस्तार होते जाता है
गुज़रते क्षणों के साथ
धारण कर लेती हो
आपना वास्तिवक रूप
और खड़ी हो जाती हो
मेरे सामने बिल्कुल सामने
यह दृष्य मेरे लिये सृष्टि का सबसे मनोरम दृश्यों में होता है,
मैं टक-टकी लगाएं
अहर्निश निहारते रह जाता हूं
मेरी निःशब्दता भी करते है गुणगान
तुम्हारे वांगमयी रूप का।
मुझे अब डर नही लगता
इन स्याह रातों से
क्योंकि मुझे यकिन है कि
तुम मेरे साथ होगी
और छट जायेंगे
डर के ये धुंध
तब मैं सो जाऊंगा
चैन की नींद में!!
नितीश कुमार
छपरा
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