देख प्रेमी का निमंत्रण
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
रात का अंतिम पहर है
झिलमिलाते हैं सितारे,
सीने में बस तुम को रखकर,
मैं खड़ा सागर किनारे
वेग से बहती हवा ये
बालों को मेरे उड़ाती,
शून्य जैसा मन लिए ये,
रात काफिर को डराती!
इन पुकारों की अवाजें
हो रही मेरे हृदय में,
था तुम्हारा जो भी था हां
अब कहो कैसे झुकूं मैं
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
दुनिया भर की सारी पीड़ा
साथ बैठी हो रो रही है,
धरती अपने आंसुओं से
पाँव अपने धो रही है,
वो भी है अपने शहर में
इक दोस्त अपना खो रही है
फीके सपनों के लिए वो
नींद सुख की सो रही है,
क्यों ज़मीं अब तक न गलकर
खत्म होकर मर गई ना
आंखें भी तेरी बता क्यों
आंसूओं से भर गई ना
मैं पड़ा तेरी कसक में
भीड़ से कैसे बचूं मैं
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
थे तो दोनों साथ फिर भी
बदलता इजहार अपना
ना सुनेंगे अब तुम्हारी
और ही संसार अपना
बूँद जैसे बारिशों की
साफ सुंदर और निर्मल
पकड़ने को जो चले हम
सब हुआ बेकार अपना,
सारे दुख से हूं मैं परिचित
लोग मिलते और बिछड़ते
त्याग कर निर्मोही आया
उठ चुका है गिरते पड़ते
देखकर तुमको भला यूं
आह कैसे अब भरूं मैं
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
जिस तरह कृष्णा के सर पे
है कहीं लहरा रहा पर
जिस तरह भूखे को लगता
फिर से भूखा सोने का डर
जिस तरह निर्मोही तुम भी
बढ़ चले हो उस दिशा में
जीत लोगे तुम जहां को
चल पड़े जो चार पल भर।
सपना को परियां सुलाती
कल्पना का लोक देकर
मुझको नींद से उठाया
जगने का संकोच देकर
है छिपा रखा कहीं पर
फिर तरसता क्यों फिरूं मैं
तीर पर कैसे रुकूं मैं
तीर पर कैसे रुकूं में!
-नितिन निर्मोही
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