वो ख़ुद जलती है
धूप में
चलती है
कांटों पर
तपती बालू पर
प्यास से सूखे होंठ लिये
भर लाती है घड़ों पानी
मीलों चलकर
खाती है चोटें
तन पर भी मन पर भी
फिर भी जलाती है
सन्ध्या का दीपक
घर की ख़ुशहाली के लिये
ख़ुद रहती है भूखी
लेकिन बनाती है त्योहार पर
मीठे पकवान
अपना जीवन थार सा है
पर बनाती है अपनों के लिये
मरुवन
....
नीलम पारीक
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