मन को मार मत अपने कुछ संवेगों को दबाकर!
मन मर कर भी जी उठता है, अनुकूल क्षण पाकर!
● मन चेतन सागर की लहर, मन तृष्णा लिप्सा का शहर!
मन चट्टानों की पगडंडी, मन दुर्गम पर्वत की डगर !
मन जानबूझ अनजान बने, हम हारे मन समझाकर।
मन गति जटिल ग्रन्थि को खोले, साधन बल सुलझा कर॥
मन मर कर भी जी उठता है अनुकूल क्षण पाकर॥१॥
● मन तो है एक अड़ियल घोड़ा, इसे मार संयम का कोड़ा।
उछल कूद नित करता है इसे बे न लगाम दौड़ा ।
गिरा देगा यह उन्मादी गहरी खाई मे जाकर !
मन तो है इक शिशु अबोध इसे दे संस्कार बड़ा कर॥
मन मर कर भी जी उठता है•••••॥२॥
● मन बस कर, पर बरबस मतकर,पर-बस मतकर समझा ले!
आत्म-शक्ति की रस्सी बनाकर, मन-घट कसकर बाँध, फाँद ले!
नीर, सत्य,प्रज्ञा का पी ले, युक्तिकर अपना कर !
मन घट भीतर ए!"बेचैन", गरल नही अमृत भर !
मन मरकर भी जी उठता है, अनुकूल क्षण पाकर॥
-P.J."Bechain"
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