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मन-रहस्य

P Joahi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन को मार मत अपने कुछ संवेगों को दबाकर!
        
                                                    
                            
मन मर कर भी जी उठता है, अनुकूल क्षण पाकर!
● मन चेतन सागर की लहर, मन तृष्णा लिप्सा का शहर!
मन चट्टानों की पगडंडी, मन दुर्गम पर्वत की डगर !
मन जानबूझ अनजान बने, हम हारे मन समझाकर।
मन गति जटिल ग्रन्थि को खोले, साधन बल सुलझा कर॥
मन मर कर भी जी उठता है अनुकूल क्षण पाकर॥१॥
● मन तो है एक अड़ियल घोड़ा, इसे मार संयम का कोड़ा।
उछल कूद नित करता है इसे बे न लगाम दौड़ा ।
गिरा देगा यह उन्मादी गहरी खाई मे जाकर !
मन तो है इक शिशु अबोध इसे दे संस्कार बड़ा कर॥
मन मर कर भी जी उठता है•••••॥२॥
● मन बस कर, पर बरबस मतकर,पर-बस मतकर समझा ले!
आत्म-शक्ति की रस्सी बनाकर, मन-घट कसकर बाँध, फाँद ले!
नीर, सत्य,प्रज्ञा का पी ले, युक्तिकर अपना कर !
मन घट भीतर ए!"बेचैन", गरल नही अमृत भर !
मन मरकर भी जी उठता है, अनुकूल क्षण पाकर॥

-P.J."Bechain"

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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