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परछाई

Paramjeet kaur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            परछाई
        
                                                    
                            

देख मेरी परछाई,जीवन के अनुभव की समझी सच्चाई।

ये अजीब और गजीब है
साथ रहकर भी छू ना सकूँ
पास रहकर पकड़ ना सकूँ....

ये एक मन मे तभी ख्याल आया
अल्लाह, रब और वाहेगुरु
सब एक ही तो है
उसकी जोत हमारे मन में तो है

यूँ लगा साथ मेरे कोई चला
मैं आगे बढ़ी , संग वो बढ़ा
मैं रुकी संग वो थमा
मैं नाची संग वो मेरे नाचा
मैं गायी संग वो मेरे गाया

ये खुशबू , ये परछाई
इन सब अनुभव से
मेरी जिंदगी मुस्कुराई

ज़ब कभी दिल भर आता
दिल खोल के आंसू बह जाता
फिर वो प्रभु मेरा मित्र
जिसका दिल में मेरे चित्र

खुशबू सा आता
फिर से खुशियाँ दे जाता।

कहावत है मुसीबत में परछाई साथ छोड़ देती है

जहाँ सब साथ छोड़ देते हैं
वहा मेरा रब साथ देते हैं।

- परमजीत कौर
 
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3 वर्ष पहले
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