मैं अछूता रहा
कई बार धन रहा दौलत रही ग़रीबी रही
पर मैं सदैव अछूता रहा
बचपन था जवानी थी बुढ़ापा था
न जाने कितनी देहो से गुजरा
कभी पक्षी कभी पशु कभी पथ्हर कभी आदमी
न जाने कितने अनगनित रूप धरे
पर मैं अछूता रहा
निरंजन निराकार