विज्ञापन

निरंजन निराकार

parasram arora

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं अछूता रहा
        
                                                    
                            
कई बार धन रहा दौलत रही ग़रीबी रही
पर मैं सदैव अछूता रहा
बचपन था जवानी थी बुढ़ापा था
न जाने कितनी देहो से गुजरा
कभी पक्षी कभी पशु कभी पथ्हर कभी आदमी
न जाने कितने अनगनित रूप धरे
पर मैं अछूता रहा
निरंजन निराकार
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anamika singer

349 कविताएं

View Profile