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ख़ामोशी

PAWAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो शोर करती थी तो जैसे
        
                                                    
                            
हवाओं में खुशबू बरसते थे
वो ख़ामोश है तो लगता है
अंधेरी तूफान है
वो बात करती थी
तो जैसे फिज़ां में फूल खिलते थे
वो ख़ामोश है तो जैसे
गुलशन वीरान है
उनकी हलचलों में जैसे
चाँदनी रात थी
उनकी खामोशी में जैसे
अमावस की रात है
उनकी खामोशी में
ख़ामोश है उनका हर गुस्सा
वो बात करे तो
मालूम हो दिल की उलझनें
ये सोच कर ख़ामोश सवाल करती है
मेरी निगाहें
काश वो मुस्कुरा दे
बात कर ले
बयाँ कर दे
अपनी लफ्ज़ों की दास्तां
तो जैसे मेरे शब्दों को
अल्फाज़ों को मिल जाये मुकम्मल जहाँ।

-पवन कुमार दास

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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