वो शोर करती थी तो जैसे
हवाओं में खुशबू बरसते थे
वो ख़ामोश है तो लगता है
अंधेरी तूफान है
वो बात करती थी
तो जैसे फिज़ां में फूल खिलते थे
वो ख़ामोश है तो जैसे
गुलशन वीरान है
उनकी हलचलों में जैसे
चाँदनी रात थी
उनकी खामोशी में जैसे
अमावस की रात है
उनकी खामोशी में
ख़ामोश है उनका हर गुस्सा
वो बात करे तो
मालूम हो दिल की उलझनें
ये सोच कर ख़ामोश सवाल करती है
मेरी निगाहें
काश वो मुस्कुरा दे
बात कर ले
बयाँ कर दे
अपनी लफ्ज़ों की दास्तां
तो जैसे मेरे शब्दों को
अल्फाज़ों को मिल जाये मुकम्मल जहाँ।
-पवन कुमार दास
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