घाटी घाटी पुकार रहीं ,
तूझको पहाड़ बुला रहीं,
गावं का यह मंजर हैं,
भूमि पड़ी सब बंजर हैं ।
बंद घाटों की कहानी हैं,
पलायन ही निशानी हैं,
धारे नौले सूख गऐ,
वो परदेश को चले गऐ ।
वो अपनों से बिछड़ गये,
उन्होनें सोचा पिछड़ गऐ,
पेड़ - पौधे सब लगा लो,
धरती को तुम स्वर्ग बना लो ।
गावं छोड़कर गया विदेश,
लौटने तक बदल गया परिवेश,
सोच रहीं हैं बूढ़ी मां भी,
लौट आएगा कल वो भी ।
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