तुम्हारी मौजूदगी से ही मौन हो जाती हूं,
तुम हो कि हमें गंवार समझते हो।
तुम्हारी दूरी ही बेचैनी का कारण बनती है
तुम हो कि पागल समझते हो।
तुम्हारी नाराजगी भी मुस्कुराहट बन जाती है
तुम हो कि खुद को हमसे दूर समझते हो।
तुम्हारी प्यारी बातें मधुर गीत सा लगता है
तुम हो कि हमें बहका हुआ समझते हो।
तुम्हारे साथ बिताए पलों ने दिल धड़काया
तुम हो कि हमें दिल के मरीज समझते हो।
जब से तुम मिले कुछ और न चाहा
तुम हो कि हमें बदमिजाज़ नीरस समझते हो।
हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।