खामोंशियाँ तो सब कह गयीं,
पर क्यों इस तरह चुप रह गयीं
क्यों न की तुमने बातें जरा,
क्यों रखा इन जखमों को हरा,
दिल क्यों तुम्हारा कहता नहीं,
मैं अजनबी हूँ घरों में रहता नहीं
जानता हूँ सब पर कहता नहीं |
पढ लेता हूँ तुम्हारी आँखें और तकदीर को,
बना लेता हूँ तुम्हारे दिल की तस्वीर को,
पर बदल नहीं पाता किस्मत की लकीर को,
पर अजनबी हूँ इस लिए कुछ कहता नहीं,
दिल के सिवा घरों में रहता नहीं.....
देखकर चेहरा जान लेता हूँ आज कया घटा है,
खुशियो का दामन तुमसे कितना पीछे हटा है,
पर अजनबी हूँ कुछ कहता नहीं,
दिल के सिवा घरों में रहता नहीं.....
जानता नहीं हूँ तुम क्या चाहती हो,
क्यों चुपचाप तुम मेरे ख्वाबों में चली आती हो,
फूलों के मखमली कपड़े पहनकर चाँदनी से नहाती हो,
पर मैं अजनबी हूँ इस लिए कुछ कहता नहीं....
क्यों तुम किसी को नहीं अपना गम बताती हो,
क्यों तुम दिल पर लगे जखमों को छुपाती हो,
आखिर क्यों तुम इस बेकसी में आँसू बहाती हो,
क्यों समंदर के रेतो से महल बनाती हो ,
जानते हुए कि ये ज्यादा देर रहता नहीं,
मैं अजनबी हूँ इस लिए कुछ कहता नहीं...
दिल के सिवा घरों में रहता नहीं.....|
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