प्यार की अपनी सीमाएं हैं कहता जितना कह पाता है
कितना भी कह डाले लेकिन अनकहा अधिक रह जाता है
इन्सान कहीं खो जाता है
मन उर्वर सा हो जाता है
कुछ खोया सा मिल जाता है
कुछ मिला हुआ खो जाता है
हर बातें अच्छी लगती हैं
शहद सी घुली लगती हैं
चलते फिरते मन में बेचैनी उठने लगती है
दिल हैरान रहता है
हर वक्त ख्याल रहता है
शाम से ही ढली रात का इन्तजार रहता है
तन्हाई की काली छाया में
प्यार ही साथ रहता है
तपती दिल की जमीन पर
सुकून की बरसात करता है
सच्चा प्रेम जब मिल जाता है
दो दिलों को अपना इक जहाँ मिल जाता है
अक्श खुद का प्यार में ढूंढने लगता है
रूठना मनाना जब प्यार में होने लगता है
जैसे वीरानों में गुलाब गुलजार होता है
जब दिल में प्यार का एहसास होता है
हौसला इसका मुश्किलों से बढ़ा करता है
प्यार वालों को रास्ता भी खुदा देता है
प्रभात जो उड़ते हैं अहम के आसमानों में
वो क्या जाने सच्चा प्यार क्या होता है।
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