वर्तमान व्यवस्था से कविता के माध्यम से कुछ प्रश्न :-
कब तक लहु बहेगा निर्दोषों का,
कब तक नयनों से नीर बहेगा लाचारों का?
कब तक होगा अत्याचार निर्बलों पर,
कब तक होगा हाहाकार चिताओं पर?
कब तक होंगी सूनी गोदें माताओं की,
कब तक आएंगी चीखें अबलाओं की?
कब तक कण्ठ रुधेंगे कवियों के,
कब तक रुदन होगा शब्दों में,
कब तक संशय होगा हृदयों में?
लोकतंत्र के ऐ निरंकुश मतवालों,
सत्तालोलुपता के उन्मत्त दीवानों,
कब तक जनता का तिरस्कार करोगे,
क्या प्रजातन्त्र की जड़ें काटकर,
मानवता का उद्धार करोगे ?
कब तक अणुबमों का खेल चलेगा,
कब तक न्यूक्लियर का भय रहेगा?
धरती का सीना फट जाएगा,
हर खेल ही मिट्टी में मिल जाएगा ।
कब तक कोविड का कोहराम मचेगा?
शायद......
इंसान के दुराचारों से,
वायुमंडल तो प्रदूषित होगा,
ब्रह्मांड भी न बच पाएगा।
प्रकृति को भी रोना आएगा
वृक्षों और लताओं पर भी
विषबमों का अम्बार नजर आएगा।
- प्रभात कुमार "प्रभात"
सी-133अपना घर कोलौनी,
हापुड़, उ.प्र।
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