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कलयुग का राही

Pradeep

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काली अंधेरी रातों में जब हम दीपक लेकर निकले।
        
                                                    
                            
बहुत लोगों ने अपना काम किया।
जब हम अंधेरे में आए।
तो लोगों ने दूर से ही प्रणाम किया l
कलयुग का राही जब भी रात के सफर में निकले

अपने साथ एक माचिस और मोमबत्ती रख ले।
पता नहीं ये अंधेरे कहां पछिया ले?
कुछ लम्हों के लिए ही सही हम!एक समा तो जला ले।
इसी आस में कि जब तक ये समा बुझे!
उजाला ही हो जाए।
और अंधेरे का मुंह काला हो जाए।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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