एक शाम आती थी ,
मानो आनंद साथ लाती थी ।
जब यारों की टोली बुलाएं ,
हम सब कुछ छोड़ कर भाग जाएं ।
दोस्तों के बुलाने पर समय न ज़ाया करते थे ,
खेल में नाइंसाफी होते ही रूठ जाया करते थे ।
निशान दादी को दिखा कर सहानुभूति मिलती थी ,
जब ना पढ़ने पर माँ से पिटाई पढ़ती थी ।
एक शाम आती थी ,
मानो आनंद साथ लाती थी ।
शाम होते ही पिताजी आते थे ,
आते आते साथ में कुछ लाते थे ।
समझ ना उस समय गाने आया करते थे ,
फिर भी हम आत्मविश्वास से गाया करते थे ।
समय उस समय चिंता मुक्त था ,
हर दिन नयी शरारत युक्त था ।
एक शाम आती थी ,
मानो आनंद साथ लाती थी ।
वो सुहाने पल भी पुराने हो गए ,
जिये उन्हें ज़माने हो गए ।
उम्र के साथ यह शाम भी बड़ी हो गई ,
सामने जीवन के कठिनाइयां खड़ी हो गई ।
सच कहूँ तो बहुत याद सताती है ,
अब वैसी शाम कहाँ आती है ।
~ प्रदुल