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कवि की कल्पना

Prafulla Awasthi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            न जाने कब ये शहर छोड़ के जाना होगा
        
                                                    
                            
कहाँ किस राह पे ग़ालिब ये ठिकाना होगा
कोई होगा वहाँ हर शाख सजाने वाला
कोई उस शाख की सिहरन का दीवाना होगा
ठिठुरती रात औऱ उस चाँदनी की चपल चमक
न जाने कैसा वो मकरंद किनारा होगा
ख्वाब जो देखा तो देखा वो झलक ऐसी थी
लगा लहरों से अपने तन को बचाना होगा 
वो नीला आसमा रातों को चमकते तारे
वो नजारा भी जाने कैसा नजारा होगा
न जाने कब .........

(प्रफुल्ल अवस्थी)

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7 वर्ष पहले
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