तुम जिस दुनिया में रहते हो
वो दुर्घटनाओं और आशंकाओं की अग्रजा है
जो अपने कमर पर
मरी हुई संवेदनाओं को बैठाकर
अढ़ाई कोस तक चली जाती है
जहाँ पर डर और वहम
भविष्य के लिए करूण कहानियाँ लिखते हैं
और संवेदनाऐं
मूक बधिर प्रशिक्षु की तरह
मौन साधती हैं
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