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इस भीड़ में

Prashant Patil

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुमकिन नहीं कि सब जिएं,
        
                                                    
                            
किसी को यहां मरना भी होगा।
कोई सुकून ओ मसर्रत की,
पालखी से गुजरे,
किसी को दर्द और रंज,
अपने कंधों पर ढोना भी होगा।
ईमान के पेड़ पर बेमानी के,
घाव चलते रहेंगे,
किसी को इसके वास्ते,
सूली चढ़कर भी
इमान बचाना होगा।
दुनिया तो भरी पडी है,
कड़वाहटों और कसीले चेहरों से,
पीकर सारे खारे आसू होटो पर मगर,
तुम्हें मुस्कान को जिंदा रखना होगा।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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