मुमकिन नहीं कि सब जिएं,
किसी को यहां मरना भी होगा।
कोई सुकून ओ मसर्रत की,
पालखी से गुजरे,
किसी को दर्द और रंज,
अपने कंधों पर ढोना भी होगा।
ईमान के पेड़ पर बेमानी के,
घाव चलते रहेंगे,
किसी को इसके वास्ते,
सूली चढ़कर भी
इमान बचाना होगा।
दुनिया तो भरी पडी है,
कड़वाहटों और कसीले चेहरों से,
पीकर सारे खारे आसू होटो पर मगर,
तुम्हें मुस्कान को जिंदा रखना होगा।
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