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अकेलापन

Pratibha Bilgi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस अकेलेपन में अजीब सी एक कशिश है ,
        
                                                    
                            
न टूटनेवाली दिल को चीरनेवाली खामोशी है ।

गहराई में बसनेवाला कोई राज है ,
भीड़ में भी सुनाई दे वो आवाज है ।

दिखाई न दे बस महसूस हो ऐसा एहसास है ,
समझ से परे न भूलनेवाला मन का आस है ।

थोड़ा उलझा थोड़ा सुलझा हुआ सा जाल है ,
लगता किस्मत की ये भी एक चाल है ।

न रुकनेवाला बहता ही जानेवाला जज़्बात है ,
मेरी हालत पर मायूस पूरी कायनात है ।

कशमकश में डोलता हुआ मेरा हाल है ,
प्यार का या जुदाई का किसका ये कमाल है ॽ


© प्रतिभा " प्रीति "

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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