इस अकेलेपन में अजीब सी एक कशिश है ,
न टूटनेवाली दिल को चीरनेवाली खामोशी है ।
गहराई में बसनेवाला कोई राज है ,
भीड़ में भी सुनाई दे वो आवाज है ।
दिखाई न दे बस महसूस हो ऐसा एहसास है ,
समझ से परे न भूलनेवाला मन का आस है ।
थोड़ा उलझा थोड़ा सुलझा हुआ सा जाल है ,
लगता किस्मत की ये भी एक चाल है ।
न रुकनेवाला बहता ही जानेवाला जज़्बात है ,
मेरी हालत पर मायूस पूरी कायनात है ।
कशमकश में डोलता हुआ मेरा हाल है ,
प्यार का या जुदाई का किसका ये कमाल है ॽ
© प्रतिभा " प्रीति "
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