काश ! दो पल हम चुरा लें
काश ! दो पल हम चुरा लें
इस वक़्त को अपना बना लें
थमता नहीं किसी के लिए भी
वक़्त को प्यार का कारवाँ बना लें।
चाँद को आज फिर हम, आस्माँ से नीचे बुला लें
चाँदनी छंटा को हम, इस धरा से फिर मिला लें
साथ मिलकर आओ बैठे इस शज़र पर
इस वक़्त को अपनी प्रीत से गुनगुना लें।
काश ! दो पल हम चुरा लें
रूह से एक बार हम, एक दूसरे को पुकारें
साँसों को हम आज फिर सोम तृष्णा बना लें
अमृत सुधा में डूब कर
इस वक़्त को अमिट लम्हा बना लें।
काश ! दो पल हम चुरा लें
प्रिय, आज फिर एक दूसरे में हम समा लें
विरह की इस अग्नि को, जन्मांतर के लिए मिटा लें
आया है स्वर्णिम ये वक़्त
आत्मसात कर, एक दूसरे में, मुकम्मल क़ाफ़िया बना लें।
काश ! दो पल हम चुरा लें।
-प्रतिभा गर्ग
गुड़गाँव
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।