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अभिषेक

PREETI CHANDAN

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभिषेक होता है आज,
        
                                                    
                            
दौलतमंदों, दबंगों और मतलबपरस्तों का,
शोषकों, उत्पीड़कों, और अत्याचारियों का|
जिनके हाथों में होते हैं सबकुछ..
कानून, इंसाफ़ और वक्त की चाल,
यश, गौरव और दौलत का अंबार|
जो अत्याचार करता है,
जो न्याय खरीदता है,
जिस घर की छत ऊंची होती है,
जिन दरवाजों पर बड़ी-बड़ी गाड़ियां होती है|
यही नहीं, जो इंसाफ पाप के नीचे दबा देता है,
बेगुनाहों को शूली चढ़ा देता है,
जो दौलत के लिए इज्जत और ईमान बेचता है,
जो इंसानी खून पीता है|
यही नहीं, जो बुराइयों और अत्याचारियों की ताजपोशी करता है,
जो झूठी अकड़ और शान दिखाता है,
जो कमजोरों पर अत्याचार करता है,
जो झूठे उसूलों और संस्कारों को बनाता है,
सच्चाई जानते हुए भी बुराई को सलाम करता है,
जो देश व राष्ट्र लूटता है,
जो कानून और इंसाफ खरीदता है,
जो क्रांति की बात करने वालों को मारता है|
'अभिषेक' अक्सर एश्वर्य से शुरू होता है,
जिसमें गुरूर का होना लाजमी है,
ये अक्सर दमनकारी और दंभी लोगों के माथे पे चमकता है|

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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