बीता दिन! कुछ घड़ियां भी
ये अंधेरा बाहर है या दिल का ही
दिल का मंज़र अब तहखाना,
है दफ़न कई सैंकड़ो बात।
सोचती हूं ......कब गुज़रेगी ये रात।
आवाज़ें बहुत है आसपास
तो फ़िर क्यों ये दबदबा ख़ामोशी का
ये हलचल उठी आज है
या किस्सा पुरानी रवानी का।
दोहराते कदम नीचे फर्श नाप रहे हैं,
ऊपर सीने में कैद जज़्बात
सोचती हूं ......कब गुज़रेगी ये रात।
तारों की चमक तो है
पर बादलों को रोशनी से वफ़ा कहां
धड़कने बहुत तेज़ हैं और मेरी सोच तन्हा।
मदद की गुहार में , हिम्मत को पुकारते मेरे हालात
सोचती हूं ......कब गुज़रेगी ये रात।
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