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एक अकेला शाम

Prem Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक अकेला शाम
        
                                                    
                            


एक अकेला शाम,थकते दिन पश्चात्,
वह भी मुझ अकेले के संग।
जिन्दगी की आपाधापी में,
पता नही, शाम हुई कब?
नही समय, अस्ताचल सूर्य की ,
लालिमा देखने की।

बगीचे में, बिखरे सूखे पत्तों पर,
चलना और हल्की चरमराहट,
एक हल्की सी आहट ,
नज़र घुमा कर देखता वह,
कोमल, निरीह गिलहरी को,
चुगती कुछ नन्हीं दातों से।

अकेले शाम में, सुनता है वह,
पक्षियों की चहचहाहट,
रात्रि पहर के आने से पहले,
गोधूलि की सभा सजी है उनकी,
बग़ीचे में, पेड़ों की डालों पर,
जाना है घोंसलों में,विश्राम ख़ातिर,
इन्तज़ार है, कल के नये सुबह की।

चन्द लम्हों की शाम,
दिन और रात के बीच,
रोज आती और चली जाती है,
मन है संध्या का , महसूस करें उसे,
विश्राम करें, आनन्दित हों,
निहारें प्रकृति के अलौकिक पहर को।
एक अकेला शाम, अकेले हम।


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6 वर्ष पहले
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