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ख्वाहिश

PrimE CoastA

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी भी उम्र की ख्वाहिश बदलने लगती है ,
        
                                                    
                            
शाम आते ही तबियत मचलने लगती है...

भटक कर आ गया हूँ संभलने की राह पर ,
अब मुक्तसर सी बात भी उलझने से लगती है...

दिनों का शोर मुझे लगता है आप सा ,
रात की हालत मुझे खुद सी लगने लगती है...

तेरे जाने का ग़म भी उतना नहीं होता ,
जब नशे में छोड़ कर बोतल निकलने लगती है...

खुद के बारे में और क्या कहूँ ,
ग़मों की धूप में हस्ती सवरने लगती है...

“रंग” का दिल साफ है इसका सबूत है ,
चेहरे के सुराखों से बातें निकलने लगती हैं...

-Anurag Mishra 

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4 वर्ष पहले
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