कभी भी उम्र की ख्वाहिश बदलने लगती है ,
शाम आते ही तबियत मचलने लगती है...
भटक कर आ गया हूँ संभलने की राह पर ,
अब मुक्तसर सी बात भी उलझने से लगती है...
दिनों का शोर मुझे लगता है आप सा ,
रात की हालत मुझे खुद सी लगने लगती है...
तेरे जाने का ग़म भी उतना नहीं होता ,
जब नशे में छोड़ कर बोतल निकलने लगती है...
खुद के बारे में और क्या कहूँ ,
ग़मों की धूप में हस्ती सवरने लगती है...
“रंग” का दिल साफ है इसका सबूत है ,
चेहरे के सुराखों से बातें निकलने लगती हैं...
-Anurag Mishra
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