पूरा नहीं तो आधा ही कर लो,
ख़्वाब में ही सही एक वादा कर लो।
नियत और नियति का है खेल सारा
चाहतें क्या है ये पहले तय कर लो।
रखा था महफूज़ सात तालों में
अपने जज्बातों को,
नुमाइश इस दर्द कि कहां से शुरू करूं
इसका भी फैसला कर लो।
नहीं है यकीन अब ख़ुद पर भी, रहा सदा अंधेरों के उजाले में,
ख़ुद की सज़ा ख़ुद ही तय कर लो।
ख़ुद को देखो ज़रा आइने में मिला के नज़रे,
जो कह सको कि "मनहर",अब पूरा नहीं तो थोड़ा ही यकीं कर लो।
मनोज "मनहर"
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