मैंने कब मांगा
अमरत्व तुमसे ।।
मैंने कब चाहा
लफ़्ज़ों में ढालो
मुझको
और लिखो मनचाहा तुम ।।
मैंने कब कहा
कैनवस पर
उकेरो मुझ को
और भरो रंग
अपनी मर्ज़ी के ।।
मैंने कब चाहा
तुम गीतों में
ढालो मुझको
और अपनी
मनमर्जी की लय दो ।।
मैं खुश हूं
अपनी अपूर्णता में,
मेरे ख्वाब,मेरी तन्हाईयां
सब के साथ
मिल कर मैं
मैं बनती हूँ,
अपनाना होगा मुझे
पूरा का पूरा
मेरे डर,मेरी कमियां
मेरी अपूर्णता
के साथ ।।
सोच सकते हो
।
।
।
(काश कह दो तुम
कुबूल है,कुबूल है,कुबूल है)
- पुष्पिंदरा चगती भंडारी
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