गुजारना सुकून के पल जहा बचपन बिताया
मिली थी जहा माँ की ममता और पिता का साया
गुनगुनाती दादी लोरी बालों को तुम्हारे सवारती
दादा देते चुरके दाल मे रोटी और तुम चटखाती
पढ़ाई की तुमने वहा जहा थी तुम्हारी पाठशाला
अव्वल आती थी तुम सदा थी होशियार बाला
जहा मनाई दिवाली और रंगों का पर्व होली
बिदा हुई घर से जहा से उठी थी सजनी की डोली
बिताया जीवन तुमने मेरे साथ पल पल संग संग
खिले फूल दो नन्हें तुम्हारे कारण खुशियां है घर आंगन
निभाया फर्ज पूरा तुमने किया जिम्मेदारी का सफल वहन
अम्मा बाबुजी हैं सदा संतुष्ट तुम्हारी परिपक्वता के कारण
मुझे अपनाया जैसा भी मिला पति तुमने था पाया
अपनापन क्या होता है आचरण से तुमने प्रमाणित किया
धन्य हूं सुखी हूं संतुष्ट हूं पाकर तुम जैसी अर्धांगिनी को
भूल ना जाना मायके जाकर तुम मुझ जैसे दीवाने को
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