विज्ञापन

मधुशाला

RAGHUVEER Patel

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तन जलाती है गर्मी मन जलाती है हाला
        
                                                    
                            
घर के अंदर पड़े हैं सब लोग लगा हुआ है ताला
कोई कहता सरकारें सारी बैर कराती मेल कराती बस मधुशाला
मैं कहता कोविड के इस दंस से क्या  बच पाएगा कोई पीने वाला
मंदिर मस्जिद सब बंद पड़े, खुली हुई है क्यूं मधुशाला।। १।।

भुखमरी से कुछ लोग हैं मरते कुछ पैदल नंगे पांव हैं चलते,
कुछ चलते चलते मौत से लड़ते कुछ पटरी पर हैं कटते।
मैं पुछूं या वो पूछे मेरे रब बता जो कोई पूछे-2
तू लेगा इसका जिम्मा या सरकारें देंगी हिसाब
कुदरत का कहर क्यूं इतना जारी था,
क्या गरीब ही धरती पर भारी था।।-2
कोई हो जो दे भर भर प्याला कहा है अब ऊपर वाला
मंदिर मस्जिद सब बंद पड़े  खुली हुई है क्यों मधुशाला।।२।।

चोरी चुपके कुछ लोग हैं जाते, मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा,-2
बाहर निकलते जब डंडे पड़ते कहां है रे तू आला।
सीना तान के लोग हैं जाते  मदिरालय, क्या इनसे ऊपर है मधुशाला-2
मंदिर मस्जिद सब बंद पड़े खुली हुई है क्यों मधुशाला।।३।।

कोई सुराही घर ले आता कोई बनाता उसमे  हाला,
कुदरत के इस कहर से क्या बचा पाएगा  कोई प्याला ।
ना कोई अपराधी  ना कोई पापी  फिर भी लगा हुआ है घर घर ताला ,
मंदिर मस्जिद सब बंद पड़े खुली हुई है,  क्यूं मधुशाला।।४।।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Aalam-e-Ghazal Parvez

273 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

11917 कविताएं

View Profile