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मौसम

Rahul Abrook

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उसने उस पेड़ को काटा,
        
                                                    
                            
ईसने उसे जला दिया,
फिर किसीने आकर उस राख़ को,
उसी तालाब में फ़ेका दिया,
जिसमें कभी उसने मेहंदी क़े हाथ धोये थे...!


मेरी राख का भी जुनून तों देख़,
फ़िर भी तेरी महक ले रही थीं,

उस पेड़ क़ी छाव् क़े कितने मौसम थे गुज़रे,
लेक़िन उस गुज़रने वाले क़ो क्या,
उसका वास्ता छाव से रहा,पेड़ का नहीं..!

रचना
अब्रूक राहुल


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6 वर्ष पहले
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