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मेरी प्रिये

Rahul Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो कहती है कुछ,
        
                                                    
                            
लिख दो मेरे बारे में।
मैं सोचता हूँ कि,
क्या लिखूँ उसके बारे में।
पूरी जिन्दगी का सफ़र,
कैसे लिख दूँ दो लाइनों मे।

कैसे लिख दूँ कलम,
से एहसासों को।
दो शब्दों मे कैसे समेट,
दूँ इस प्यारे नाते को।
चंद लफ्जों में कैसे पूरी,
कर दूँ उन हजार बातों को।

माना शब्दों में लिख,
दूँ मैं बातों को।
चेहरे और तन की,
सजावट को।
बोलने, चलने के सलीके को।

लेकिन कैसे लिख दूँ मैं,
उसके साथ के एहसासों को।
कैसे लिख दूँ मैं,
उसके उर के भावों को।
कैसे लिख दूँ मैं,
उसके प्रेम को।

कैसे लिख दूँ मैं,
उसके मानस तरंगों को।
और कैसे लिख दूँ,
मैं उसके उस,
निस्वार्थ समर्पण को।

नहीं 'मेरी प्रिये'
संभव नहीं है कि,
मैं लिख दूँ,
तुम्हारे बारे में।


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6 वर्ष पहले
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