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लॉक डाउन

Rahul Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लॉक डाउन , बंद, प्रतिबन्ध
        
                                                    
                            
लक्छ्मण रेखाओं में बंधा आदमी
अपनी ही बेड़ियोँ में जकड़ा हुआ आदमी
बाहर और भीतर हर तरफ से व्यथित आदमी
अदने से वायरस से आज फिर हारा वो आदमी
सिकंदर बना फिरता था एटम बम पर बैठा आदमी
प्रकृति को जीतने निकला बौना सा ये आदमी
खुद आदमी से आज तक जो जीता ना आदमी
भौतिकता की अंधी दौड़ में अंधा हुआ ये आदमी
उसी भौतिकता से आज हारा हुआ है ये आदमी
यूँ तो अपने ही गुमान में जीता था कभी ये आदमी
आज हो लाचार दूजों से मिलने को तरसता ये आदमी
ढ़ेरों बेबसी और लाचारियों से दम तोड़ता ये आदमी
अपने ही सायों में सिमटने को मजबूर ये आदमी
अब भी वक्त है समझ इन इशारों को तू आदमी
तेरे बिन संवरती इस प्रकृति को देख तू आदमी
ये फिर से थाम लेगी तुझको ए मजबूर आदमी
तरीके सीख तू इसके साथ चलने के मग़रूर आदमी
फैला हाथ अपने समा ले सारी कायनात तू आदमी
छोड़ , लेना और सिर्फ लेना, तू देना भी सीख आदमी
जिन्हें तू ढोर कहता है सीख ढंग जीने का उन्हीं से आदमी
इस अकेलेपन में खुद को भी कुछ खोल आदमी
बहुत जी लिया गफलत में गैरों की ए आदमी
खुद के लिए भी तो कुछ लम्हें खरीद ए आदमी
ये धरती फिर संवर जाएगी पहले जैसी ही आदमी
तू एक कदम उसकी तरफ धीरे से तो बढ़ा आदमी
माँ प्रकृति फिर बोल रही मैं अब भी अपना लूँ तुझे
एक पुत्र धर्म तू भी तो निभा ले रे आदमी

राहुल मिश्रा, गाडरवारा


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5 वर्ष पहले
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