और एक रात गुज़र गई
जैसे पिछली कितनी अनगिनत रातें गुजरी हैं
न जाने क्यूं मगर ये ख़्याल आता है
कि और कितनी रातें आयेंगी जायेंगी
यूं ही, ऐसे ही,
हर सुबह मैं जो सम्भलता नहीं
बहका बहका सा रहता हूं
कुछ ढूंढता रहता हूं , सहमा सा रहता हूं
बैचैनी अब बढ़ने लगी है ,
सहसा किसी चमत्कार की आशा में
झांकता रहता हूं खिड़की से उस संकरी गली में
जहां से होकर मैं एक रोज गुज़रा था
जहां से होकर पहुंचा था यहां ,
धीरे धीरे पैर जमे मैं आस्वस्त हो गया
कि अब यही मंज़िल है
बाहर निकला, लोगों से मिला
कुछ दोस्त बने, कितनों ने आंखें दिखाई
और फिर रात हो गयी
हर तरफ अंधेरा था, सूनसान गुप्प अंधेरा
गली में कोई साया तक न दिखता था
गली के नुक्कड़ पर जहां वो स्ट्रीट बल्ब चमकता था
बुझ चुका था, या शायद वो था ही नहीं वहां कभी
मेरी कल्पनाओं का मात्र एक छलावा था,
और ये रात अब तक कायम है
सारे छलावे हंस रहे हैं इस रात के सन्नाटे में
मैं सुन सकता हूं उनकी हंसी
ये रात कब बीतेगी
कब सूरज की रोशनी इस घर तक आएगी
कब दिन होगा
जाने कब वो मंज़िल मिलेगी
जिसे ढूंढते-ढूंढते रात हो गयी ।
राहुल
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