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कालचक्र

raj rashmi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कालचक्र
        
                                                    
                            
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इस रंग बदलती दुनियाँ में मैंने भी
जीने का हर ढंग बदलते देखा ।

वह चाल जिसमें शेरों -सा
गुमान नज़र आता था,
उसको भी पावँ बढाने को
सहारा लेते देखा।

इस रंग बदलती दुनियाँ में मैने भी
जीने का हर ढंग बदलते देखा ।

जिनकी 'गर्जन" बिजली-सी
कड़कते देखा था
उनके अधरों पर भी जबरन;
ताला जकडे देखा ।

इस रंग बदलती दुनियाँ मे मैं ने भी
जीने का हर ढंग बदलते देखा ।

जिनकी आहट मात्र से
सांसे थम जाया करती थी,
सूखे पत्तों की भांति
उनमें भी कंपन देखा।

इस रंग बदलती दुनियाँ मे मैं ने भी
जीवन का हर ढंग बदलते देखा।

नौकर-चाकर भी थे सारे
दौलत-शोहरत सबके होते
कालचक्र में हर आज को
झंझावत-सा शांत होते देखा।

इस रंग बदलती दुनियाँ मे मैं ने भी
जीवन का हर ढंग बदलते देखा।

अक्क्ड़ किस बात की इतनी थी
सांसे तो आज भी ज़िंदा हैं
समय की धारा मे उनको भी
निरीह होते देखा ।

इस रंग बदलती दुनियाँ मे मैं ने भी
जीवन का हर ढंग बदलते देखा।

- *मुक्ता रश्मि *
26फरवरी 2021
 
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