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ख़्वाब

Raj Shekhar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खुली आंखों से हमने ख़्वाब सजाए हैं,
        
                                                    
                            
ख़्वाब जो कुछ अपने और कुछ पराए हैं।
पलकों की सिलवटों में जिनको छुपाया है,
ज़माने की बुरी नज़रों से उनको बचाया है।

चांदनी सी शीतलता लिए हैं कभी तो,
कभी दुपहरी का गर्म साया हैं।
कभी गुदगुदाकर हंसाया है हमको
कभी जी भरकर रुलाया है।

ख़्वाबों की फितरत भी कितनी अनोखी है,
कभी मीठी चाशनी है, कभी तीखी से मिर्ची है।
कभी मायूस कर देते हैं यह हम को,
कभी उम्मीद का दामन थमाते हैं।

नींद के आगोश में जो सुनहरे रंग भरते हैं,
खुली आंखों से हकीकत को दिखाते हैं।
चाह कर भी वो न मिल पाते हकीकत में,
ख़्वाब जो हम खुली आंखों में सजाते हैं।

कल्पना सिंह
आदर्श नगर, बरा, रीवा (मध्य प्रदेश)

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