याद है तुम्हें वो दिन
जब अखबार ले हाथ में
दो प्याली चाय ले साथ में
संग बैठ बिताते थे
सुबह और शामें सुनहरी
कैसे वो ज़ुल्फें झटका
अपने नैनों को मटका
उड़ा ले जाती थी
वो रंगीन पन्ना अखबार का
अपने किसी प्रिय की खबर
किस तरह काट कर
फाइल में सजा देते थे
कैसे चटखारे ले सुनाते थे
रंग बिरंगी खबरें
कोई खूबसूरत फोटो देख मचल
कितना सताते थे उसे
अपनी प्रेयसी से ज्यादा इन्तजार तो
तुम अखबार वाले का किया करते थे
पर अब तो अखबार वाले का
नाम तक ना जानते
मुझ अखबार को तो बिना पढ़े ही
पटक देते हो रद्दी में
और पढ़ लेते हो खबरें
अपने अपने मोबाइल में
अलग कमरों में बैठ
एकान्त अकेले में
पहले की तरह कहाँ मांग पाते
किसी अखबार का पन्ना
अजनबी से
सार्वजनिक वाचनालय तो
जानते भी नहीं
आजकल के बच्चे
भाई बहिन भी कहाँ लड़ते
अब अखबार के वास्ते
सच कहूँ
बड़ा तरस आता है
तुम लोगों पर अब
क्या कमी नहीं खलती
उस चाय के प्याले की
उन बातों की जो बैठ करते थे
मुझे पढ़ते पढ़ते
उन झगड़ों की जो करते थे
मेरे वास्ते
मेरा तो कुछ नहीं गया
मैं तो पहले भी रद्दी में ही जाता था
पर अब
मेरे बिना हो रही रद्दी
तुम लोगों की जिन्दगी भी।।
- प्रभात
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