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खामोश अंधेरे

Rajesh Gosain

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंधेरे बहुत छायें हैं, जिन्दगी में मेरी
        
                                                    
                            
कतरा ढूंढने चला हुँ रोशनी का अब

खामोशियों का कोई गम नहीं है मुझे
गम है कि खामोशियां खामोश क्यों हैं

कोशिश है उठा लूं एक टुकड़ा मैं भी
ये रोशनी तो मुट्ठी की दुशमन है मगर

आज चुपके से अंधेरे ने आँख से पूछा
रोशनी कहाँ से लाई है जालिम बता ना

खामोश नजरें भी लड़ने लगी अंधेरों से
बता कहाँ छुपा रखा है तूने रोशनी को

- राजेश गोसाईं

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8 वर्ष पहले
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