दिल की महफ़िल सजी है चले आइये,
आपकी ही कमी है चले आइये।
खत में मैंने सनम हाल-ए-दिल लिखा,
आपने पढ़ तो ली है चले आइये।
यूँ तो मेहमां यहाँ हैं हजारों मगर,
आप ही तो नहीं हैं चले आइये।
ढूँढ़ता हूँ इधर तुम हो जाने किधर,
यह नज़र ढूँढ़ती है चले आइये।
इंतहा हो गयी अब तो इंतज़ार की
आँख फिर आ भरी है चले आइये।
अब परिन्दे भी लौट आये हैं शज़र,
साँझ ढलने लगी है चले आइये।
- राकेश कुमार पंडित
वैशाली (बिहार)
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