बरसाने की ओर, चलीं सज धज मुटियारें।
लठ मारें मुस्काय, बहें रंगों की धारें।
मनवा है मदहोश, पिया पर रंग बरसाए।
लाज शर्म सब छोड़, सजन को गले लगाए।।
- राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'
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