वक्त ने जो भी दिये वह ज़ख़्म सारे भर गये
बीच मझंधारों के पलते हुमहुमाते तर गये
इश्क़ ने तौफ़ीक़ दी औ' हुस्न ने जादू किया
दिल में इक उम्मीद ले कर हम भंवर भी तर गये
धूप छाओं का सफ़र था लौट कर ख़ाली चले
एक मुद्दत हो चली उस पार अपने घर गये
कम नहीं थे दिल दुखाने चोट खाने के सितम
द्वार दाता के रहे औ' ज़ख़्म सारे भर गये
कष्ट, उलझन से भरे थे जिंदगी के रास्ते
आ के उल्फ़त की गली हर बात हम सर कर गये
- राकेश मल्होत्रा 'नुदरत'