धैर्य में जिससे पराजित सर्वदा अवनी
धन्य है वात्सल्यदेवी स्नेहमयि जननी।।
वक्ष से प्रस्फुटित जो अमृतमयी धारा
है ऋणी प्रति बिंदु का संसार यह सारा।।
लेश भर संताप से हो करुण-रस-अयनी
धन्य है वात्सल्यदेवी स्नेहमयि जननी।।
है निरा हतभाग्य इससे जो रहा वंचित
कर न पाया स्वयं को मातृत्व से सिंचित।।
अंक से लिपटी न जिसके माँ सजलनयनी
धन्य है वात्सल्यदेवी स्नेहमयि जननी।।
थपकियों से जो अनिद्रा दूर कर देती
जो सहज स्पर्श से आनंद भर देती।।
है सदा जिससे प्रकाशित तम भरी रजनी
धन्य है वात्सल्यदेवी स्नेहमयि जननी।।
हो धुरी परिवार की तुम प्रेम रस गागर
है हृदय निःसीम जैसे हो महासागर।।
तू अहर्निश कर्मणा तू न्यूनतम शयनी
धन्य है वात्सल्यदेवी स्नेहमयि जननी।।
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