ज़िन्दगी के हर पल एक राह होते हैं
हर पल उस ज़िन्दगी के निशान होते हैं
उस निशान पर चलते जाओ बस चलते जाओ
कहीं तो वो राह मिलेगी जो हमें कहीं जाने देगी
हम तो बस सूनसान से इस जंगल में
यूं ही अकेले खड़े थे
सोचा ना था कभी काले साये से घिरेंगे
अचानक से आज पता नहीं क्यों मन में ये बात आई
कहीं हम अपने अंत पर तो नहीं थे
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।