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कविता -हार की जीत

Rambriksh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            स्वतंत्र चिड़िया ही बनाती है घोंसला
        
                                                    
                            
बंद पिंजरे में तो बंद हो जाती है हौसला
हारी कटी पतंग समझते हैं जिसको
असर में स्वतंत्र उड़ चली मनचली है
कहां पर गिरेगी कहां पर रुकेगी
कहां है ठिकाना ना उसको पता है
किस्मत का खेल है ही निराला
गुलामी के दौर से ही तो नहीं है
पुस्तक का थैला विद्यालय का रास्ता
ख्यालों में सजाए हुए स्वर्ण सपना
लौट करके आना सिमट जाना मां से
बचपन में होता पराया भी अपना
था डूबा इसी ख्याल में एक बालक
गया टूट जैसे लरी मोतियों का
बोला जब मालिक अरे सुन रहा है
धोना है थाली ग्राहक है बैठे
उधर तू खड़ा क्या कर रहा है
धुआं सा अंधेरा हुआ मन विकृत
चित् में ही चित्त हो गया स्वप्न सारा
सूरज उदय कभी ना हुआ है
न आता अंधेरा खुद ही कभी भी
सोंचा जो जैसा हो वैसा ही पाया
हुआ भाग्योदय दिशा जब सही है
गिरकर उठना उठकर गिरना
जीवन विरोधी सदा ही रही है
हार दिल से लगी है गले में पड़ी है
हार की ही जीत हमेशा हुई है

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4 वर्ष पहले
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