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कुदरत का दिल

Ramesh chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                             कुदरत का दिल 
        
                                                    
                            

कुदरत की रचना या कविता
दोनों का है मूल, भाव में
एक हृदय से,एक प्रकृति से
सुन्दर कृति, कुदरत के दिल की,

सब के दिल मे भाव जागते
प्रकृति की गति से सदा उपजते
कुदरत के गुण प्रेम, रंग रस
निश्चित रचना सुन्दर रचते,

बन, उपवन, बागानों में भी
रचनाएँ फूलों की सजतीं
मोहक सौरभ नित बिखरातीं
सबके दिल में,खिलती रहतीं,

मेघ घुमड़ते, वर्षा रिमझिम
रातों में तारों की टिम टिम
झरने, नदियाँ बहतीं कलकल
कुदरत का दिल रचता प्रति पल,

सूरज, चँदा, तारे, पर्वत
नदियाँ, झरने, सागर उपवन
नील गगन में उड़ते पंछी
कविता सी रचना कुदरत की,

कुदरत का दिल, अति विस्तारित,
तन, मन सब का, उससे निर्मित,
कुदरत संग दिल, तन, मन, मुखरित,
उसका ही जीवन है, निखरित।
रमेश शुक्ल ~


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